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Sunday, February 17, 2013

"काम पर जा रहे लोग"

कितने खुश किस्मत हैं
काम पर जा रहे लोग
जानता है बेकार और बीमार आदमी।

-निशांत
(कविता संग्रह -"बात तो है जब" से)

कविता-"महत्वपूर्ण"

बच्चा है कि घर भर में
सुनाता फिर रहा है
अपनी कविता
(कार्य कलाप रुपी)
और मैं हूँ कि
उलझा हूँ
कागजी कविता में।
-निशांत
(कविता संग्रह -"बात तो है जब" से)

भजन

साँवरा आओ तो खरी जी मोहन आओ तो खरी।
माधु रे मिन्दर में मीरां एकली खङी।

थे केवो तो साँवरा म्है मोर मुकुट बण जाऊं।
पैरण लागो साँवरा थारै सिर पर ई रम जाऊं।

थे केवो तो साँवरा म्है जळ जमना बण जाऊं।
नहावण लागो साँवरा थारै अंग-अंग रम जाऊं।

थे केवो तो साँवरा म्है हिवङे हार बण जाऊं।
पैरण लागो साँवरा थारै हिवङै में रम जाऊं।

थे केवो तो साँवरा म्है काजळीयो बण जाऊं।
काजळ काडो साँवरा थारै नैणां में रम जाऊं।

थे केवो तो साँवरा म्है बाँसुरङी बण जाऊं।
बंसी बजाओ साँवरा थारै होठां में रम जाऊं।

मीरां हर री लाडली, है बचनां री साची।
गोपीयां रै स्याम आगै बाँध घुघरा नाची।

साँवरा आओ तो खरी जी मोहन आओ तो खरी।
माधु रे मिन्दर में मीरां एकली खङी।                  

Just a minute sir इसे मत पढ़ना

भाई साहब!आपसे हाथ जोड़कर एक प्रार्थना है कि मैंने जो लिखा है उसे मत पढ़ना।अब आप कहोगे कि ये कैसे हो सकता है! क्या कोई लेखक अपनी लिखी हुई रचना को भी पाठक को पढ़ने से मना कर सकता है भला?लेकिन क्या करूं ऐसा ही है इसलिए आप मेरी मज़बूरी को समझिए और इसे मत पढ़ें|अरे साहब! मैं आपसे ही कह रहा हूँ कि इसे पढ़कर कुछ हाथ नहीं लगेगा।कमाल है आप तो बड़े "वो" हैं रुकते ही नहीं। ये लो आप को तो रोकने का कोई फायदा ही नहीं है।मैं रोकता रहा और आप पढ़ते ही चले गए। तो जनाब अब आप ही बताइए इसे पढ़कर कुछ् हाथ लगा क्या!! वैसे इस रचना को पढ़ने और एन्जॉय करने के लिए धन्यवाद प्यार बनाएं रखें,जय हिंद।जय हिंद!! मतलब ये पूरा हो गया।

-हरीश हैरी,बहलोलनगर।

"कचोट"

जिस दिन से
 देखा है मैंने
 अपने एक नजदीकी
 रिश्तेदार के
 नंगे दरवाजे के लिए
 टाट की 'पल्ली' तक का
 अभाव
 मुझे मेरी
 खिङकी के पर्दे
 अखरने लगे हैं।
-निशांत